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प्रादेशिकीउत्तर-प्रदेश Alert Star Digital Team Dec 2, 2024 08:52 PM

हाथी से उतर चुके कांशीराम के साथियों पर मायावती मेहरबान, बसपा में घर वापसी का बनाया प्लान

हाथी से उतर चुके कांशीराम के साथियों पर मायावती मेहरबान, बसपा में घर वापसी का बनाया प्लान

हाथी से उतर चुके कांशीराम के साथियों पर मायावती मेहरबान, बसपा में घर वापसी का बनाया प्लान

उत्तर प्रदेश की सियासत में एक के बाद एक चुनाव में मिल रही हार से बसपा प्रमुख मायावती हताश हैं. बसपा से खिसके सियासी जनाधार को दोबारा से पाने का मायावती का फार्मूला फेल होता जा रहा है. ऐसे में बसपा के हाथी से उतर चुके कांशीराम के साथियों की मायावती को याद आने लगी है. बसपा छोड़कर गए नेताओं की ‘घर वापसी’ का दरवाजा मायावती ने खोल दिया है. ऐसे में देखना है कि मायावती के चलते बसपा छोड़ने वाले नेता क्या वापसी करेंगे?कांशीराम ने उत्तर प्रदेश को दलित राजनीति की प्रयोगशाला बनाया था. कांशीराम ने दलित, पिछड़े और अति पिछड़ा वर्ग के तमाम नेताओं को साथ लेकर दलित समाज के बीच राजनीतिक चेतना जगाने के लिए बहुजन समाज पार्टी का गठन किया था. कांशीराम के साथ सियासी पारी शुरू करने वाले नेताओं ने मायावती का सियासी कद बढ़ने के बाद एक-एक कर छोड़ गए या फिर मायावती ने खुद उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया. मायावती के सियासी कहर का शिकार कब, कौन, कहां और कैसे हो जाए कहा नहीं जा सकता. मायावती ने उन नेताओं को भी नहीं बख्शा, जिन्हें उनका करीबी भी माना जाता था.मायावती कामयाबी की सीढ़ी चढ़ती गईं. 2007 में बसपा सूबे में ऐतिहासिक जीत का परचम फहराया, लेकिन इस सफर में कांशीराम के वो सभी साथ बसपा से दूर हो गए जो कभी पार्टी की जान हुआ करते थे. इसके चलते बसपा का सियासी आधार दिन ब दिन सिकुड़ता चला गया. बसपा आज यूपी में उस स्थान पर खड़ी है, जहां 1989 में हुआ करती थी. बसपा को 2024 के लोकसभा चुनाव में सिर्फ 9.39 फीसदी वोटर यूपी में मिल थे, लेकिन खाता नहीं खोल सकी थी. इसके बाद हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, महाराष्ट्र, झारखंड और यूपी उपचुनाव में बसपा को तगड़ा झटका लगा है, जिसके बाद पार्टी प्रमुख मायावती को बसपा छोड़ गए नेताओं की याद आई है.मायावती ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के पदाधिकारियों की बैठक शनिवार की थी. ऐसे में 15 जनवरी से पार्टी संगठन का विस्तार करने का निर्देश देने के साथ पुराने कर्मठ नेताओं को भी दोबारा जोड़ने का फरमान दिया है. मायावती के दिशा-निर्देश के बाद ऐसे नेताओं के लिए पार्टी में वापसी का रास्ता खुल गया है. 2012 में बसपा के सत्ता से बेदखल होने के बाद बसपा के तमाम नेता पार्टी छोड़कर चले गए हैं, जिसमें ओबीसी और मुस्लिम ही नहीं बल्कि दलित समाज के भी नेता है.यूपी में बसपा की सियासी ताकत सिर्फ दलित वोटों के सहारे नहीं बढ़ी थी बल्कि बहुजन वोटों के जरिए मिली थी. बहुजन के तहत दलित, ओबीसी और अति पिछड़े वर्ग की तमाम जातियों का साथ था. पिछले एक दशक में बसपा से सैकड़ों बड़े नेता पार्टी छोड़कर चले गए हैं जबकि दूसरे दलों से कोई बड़ा जनाधार वाला नेता नहीं आया है. बसपा से गए नेता सपा और बीजेपी में सियासी संजीवनी देने का काम किया है तो बसपा का कोर वोटबैंक जाटव समाज भी छिटकने लगा है. यही वजह है कि मायावती अब बसपा से गए नेताओं की घर वापसी का ताना बाना बुन रही है ताकि दोबारा से पार्टी को मजबूती दी जा सके.मायावती के दिशा-निर्देश के बाद बसपा के पुराने नेताओं को मनाने की कवायद शुरू होने जा रही है. सूत्रों की मानें तो पहले चरण में बसपा ने अपने उन नेताओं को लाने का प्लान बनाया है, जो पार्टी छोड़ दिए हैं, लेकिन उन्होंने किसी भी दल का दामन थामा नहीं है. वो अपने घर बैठे हुए हैं. मायावती अब उन्हें दोबारा से बसपा में लाने की रणनीति बनाई है. इसके बाद बसपा का फोकस उन नेताओं पर होगा, जो पार्टी छोड़कर सपा, बीजेपी और कांग्रेस में गए हैं, लेकिन उन्हें सियासी ओहदा या कद नहीं मिल सका. इस तरह के नेताओं को शामिल कराने की है ताकि सियासी नैरेटिव खड़ा किया जा सके.बसपा में रहते हुए स्वामी प्रसाद मौर्य, लालजी वर्मा, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, इंद्रजीत सरोज, रामअचल राजभर, सुनील चित्तौड़, बृजलाल खाबरी, दद्दू प्रसाद, बाबू सिंह कुशवाहा, नकुल दुबे, अब्दुल मन्नान, लालजी निर्मल, राज बहादुर, राम समुझ, हीरा ठाकुर और जुगल किशोर जैसे नेताओं की तूती बोलती थी. बसपा छोड़कर दूसरे दल में गए इन नेताओं को बसपा जैसा रुतबा हासिल नहीं हो सका. बृजेश पाठक जरूर डिप्टी सीएम हैं, लेकिन बाकी नेता सियासी मुकाम हासिल नहीं कर सके.मायावती अपने पुराने नेताओं की घर वापसी के जरिए 2027 के विधानसभा चुनाव की सियासी बिसात बिछानी चाहती है. बसपा की रणनीति है कि पुराने नेताओं को एकजुट करके पार्टी के खिसकते जनाधार को रोका जा सके. कांशीराम के दौर में बसपा दलित-मुस्लिम-अति-पिछड़ी जाति के गठजोड़ की हिमायती रही है, लेकिन मायावती के दलित-ब्राह्मण कार्ड चला, जिसका नतीजा रहा कि मुस्लिम धीरे-धीरे सपा में और अति-पिछड़ी जातियां बीजेपी में शिफ्ट होते गए और 2024 के लोकसभा चुनाव में पूरी तरह से चला गया.बसपा को सियासी झटका लगने के बाद मायावती एक बार फिर से अपने पुराने समीकरण पर लौटना चाहती है, जिसके लिए वो अपने पुराने नेताओं की घर वापसी का प्लान बनाया है. मुस्लिम और गैर यादव ओबीसी जातियों को दोबारा से लाने की कवायद में है. इसीलिए बसपा अपने पुराने उन नेताओं को दोबारा से लेने की जुगत में हैं, जिनका अपने-अपने समाज के बीच मजबूत पकड़ और पहचान रही हैं. अब देखना है कि मायावती का घर वापसी का फार्मूला कितना सफल रहता है?

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