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विचारज्ञान-विज्ञान Alert Star Digital Team Sep 1, 2015 11:27 AM

असली जैसे काम करेंगे कृत्रिम घुटने

मनुष्य के घुटने की संरचना एवं कार्यप्रणाली अत्यंत ही जटिल होती है लेकिन वैज्ञानिकों ने जियोमेट्री की एनयूआरबीएस विधि की मदद से प्राकृतिक घुटने के सदृश एवं उसकी तरह काम करने वाले कृत्रिम घुटने का विकास किया है।

असली जैसे काम करेंगे कृत्रिम घुटने

मनुष्य के घुटने की संरचना एवं कार्यप्रणाली अत्यंत ही जटिल होती है लेकिन वैज्ञानिकों ने जियोमेट्री की एनयूआरबीएस विधि की मदद से प्राकृतिक घुटने के सदृश एवं उसकी तरह काम करने वाले कृत्रिम घुटने का विकास किया है। 
गठिया, ऑस्टियो आर्थराइटिस अथवा दुर्घटना के कारण चलने-फिरने में लाचार हो चुके मरीजों को कई बार घुटना बदलवाने की जरूरत पड़ जाती है लेकिन ऐसे मरीजों के लिये एक खुशखबरी यह है कि एनयूआरबीएस विधि की मदद से अब ऐसे कृत्रिम घुटने का निर्माण होने लगा है कि जो आकार-प्रकार में प्राकृृतिक घुटनों के समान होने के अलावा प्राकृतिक घुटनों की तरह काम करते हैं। एनयूआरबीएस (नॉन यूनिफार्म रैशनल सपलाइन सरफेसस) तकनीक थ्री डायमेंशनल (3 डी) जियोमेट्री पर आधारित ऐसी विधि है जिसकी मदद से किसी भी तरह के जटिल से जटिल त्रिआयामी (3 डायमेंशनल) स्वरूप बनाए जा सकते हैं। इस तकनीक का इस्तेमाल अब कृत्रिम घुटनों में निर्माण में भी होने लगा है जिसके कारण इस तकनीक की मदद से बनने वाले कृत्रिम घुटने बिल्कुल प्राकृतिक घुटने के सदृश होते हैं और प्रत्यारोपण के बाद प्राकृतिक घुटने की तरह काम करते हैं तथा मरीज को किसी भी तरह की दिक्कत नहीं आती है। 
अमरीका के मैक्स मेडिकल ने एनयूआरबीएस तकनीक की मदद से 'फ्र ीडम नीÓ नामक कृत्रिम घुटने का निर्माण शुरू किया है जिनकी संरचना, गतिशीलता एवं कार्य प्रणाली प्राकृतिक घुटने के समान होते है। फ्रीडम नी को खास तौर पर एशियाई और भारतीय लोगों के घुटने के आकार -प्रकार तथा भारतीय लोगों की कद-काठी, उनकी जरूरतों एवं उठने-बैठने को तौर-तरीकों को ध्यान में रखकर भी डिजाइन किया गया है और इस कारण इसे स्थानीय घुटने अथवा 'एशियन नीÓ भी कहा जाता है। 
अध्ययनों से पता चलता है कि भारतीय लोगों को उठने-बैठने की अपनी आदतों तथा रोजमर्रे के कामकाज को निबटाने के लिए घुटने को अधिक मोडऩा पड़ता है। इसके अलावा पश्चिमी दशोंं की तुलना में एशियाई लोगों के घुटने छोटे एवं अलग आकार के होते हैं। 
साथ ही साथ ओस्टियोपोरोसिस एवं इलाज में देरी के कारण घुटने की हड्डी का घनत्व एवं उसकी गुणवत्ता खराब होती है और यही कारण है कि भारतीय एवं एशियाई मरीजों में घुटने के ज्यादातर ऑपरेशनों के दौरान अपेक्षाकृत अधिक हड्डी काटने या छिलने की जरूरत पड़ जाती है। साथ ही घुटने बदलने के ऑपरेशन के बाद भी मरीज को घुटने में दर्द, सूजन एवं अन्य समस्यायें बनी रहती है। 
लेकिन फ्रीडम नी के विकास के बाद यह समस्या खत्म हो गई है। 
नयी दिगी के शालीमार बाग स्थित मैक्स हॉस्पिटल के वरिष्ठ आर्थोपेडिक सर्जन तथा आर्थोपेडिक्स एंड ज्वाइंट रिप्लेसमेंट के संयुक्त निदेशक डॉ. पलाश गुप्ता ने यह जानकारी देते हुए बताया कि वह पिछले एक साल से अधिक समय से भारतीय मरीजों में फ्रीडम नी प्रत्यारोपित कर रहे हैं और पहले की तुलना में अब मरीजों को ऑपरेशन के बाद बहुत कम दिक्कतें होती हैं। ये घुटने अब कई अस्पतालों में भी उपलब्ध हैं और कई रोगियों में इन्हें प्रत्यारोपित किया गया है और इसके परिणाम बहुत ही बेहतर पाए गए हैं। डॉ. पलाश गुप्ता के अनुसार ये घुटने अत्यधिक लचीले (फ्लेक्सिबल) हैं और ऑपरेशन के बाद भी मरीज आलथी-पालथी मार कर बैठ सकता है। इस विशेष कृत्रिम घुटने को प्रत्यारोपित करने के दौरान रक्त की बहुत कम क्षति होती है और इस कारण से मरीज को रक्त नहीं चढ़ाना पड़ता है। यह ऑपरेशन एक छोटे से चीरे के सहारे ही कर दिया जाता है। 
ऑपरेशन के लिये कम मांसपेशियों एवं हड्डियों को काटना पड़ता है जिसके कारण मरीज शीघ्र स्वास्थ्य लाभ करता है और ऑपरेशन के बाद उसे प्राकृतिक घुटने की तरह महसूस होता है। मरीज ऑपरेशन के दूसरे दिन ही बिना किसी सहारे के चलने-फिरने लगता है तथा तीसरे दिन सीढिय़ां चढऩे-उतरने लगता है। मरीज को तीन-चार दिन से अधिक समय तक अस्पताल में नहीं रहना पड़ता है।

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